"FFF - Fight For Freedom"
Independence Day, 15 August.
"आझादी से लडना हैं या आझाद होने के लिए लडना है"
हम तो ईसी चक्कर मे उम्र गुजार दे,
हर दिन एक जैसा ही होता हैं, मगर आज, आज के दिन मे ही कुछ खास बात हैं, ना जाने क्यों सुबहा के 5 बजे से ही लगने लगता हैं आज का दिन कुछ और हैं. पुरे भारत मे छुट्टी का दिन होता हैं, सुबहा के होते ही "जहा डाल डाल पर सोने की चिडिया करती हैं बसेरा, वह भारत देश हैं मेरा " ये गाना कानो को सेहलाता हैं, सुबहा उठो, नहाओ, धोकर रखा हुवा स्कूल उनिफॉर्म पहनो, मम्मी टाय पिन करके देती थी, शूज की लेस भी मम्मी ही बांध के देती थी, और आखीर मे शर्ट के पॉकेट को एक छोटासा झंडा लगाकर दिया जाता था. हमसे हमारी नाक संभाले नही जाती थी, उसी उम्र मे हम तिरंगा हमारे शर्ट को लगाए फिरते थे. 15 th August, ये दिन बडा ही प्यारा था हमारे लिए, जो कभी स्कूल मे भी नही आता था उससे भी मुलाकात हो ही जाती थी इस दिन मे.
मै खुद इतना बडा हो गया हू की अब ये फोटो भी कितनी छोटी लग रही हैं, ये हमारी बचपन की फोटो हैं, 15 August की, बोहत छोटा था मै तब, आज खुद का बचपन लिखने जितना बडा हो गया हू, और ये जो तीर की कमान झुकी हैं वही मै ठेहरा हू. कुछ भी हुवा तो चल जाता था मगर मै लाइन मे first ही रहता था, ऐसा लगता हैं मेरा बचपन मुझे ताड रहा हो.
लोग आझादी का जशन मनाते हैं, मै कहता हू आझादी कभी पिछा नही छोडने वाली, यहा हर कोई यादो से भाग रहा हैं, कोई पुरानी यादो से आझादी चाहता हैं जैसे की मै, तो कोई नये बहाने बनाना जानता हैं, कोई कुछ खोकर रुठा हैं, कोई कुछ पाने की आस लगाए बैठा हैं, हर उस चीज मे आझादी अटकी पडी हैं जो चीज इनसान पाना चाहता हैं, किसीको डर हैं कुछ ना मिला तो आझादी छिन जाएगी, किसीको आरजू हैं कुछ मिला तो आझादी पा लुंगा, ये एक आझादी ही तो हैं जो कभी पिछा नही छोडने वाली. चिजोको इतना भी क्या याद करना की आंख नम हो जाये.
खैर हम बात कर रहे थे हमारा बचपन, हमारा स्कूल,
पुरा स्कूल बच्चो से भर जाता था, तो कुछ बच्चे मैदान के बहार भी खडे हो जाते थे, जिस स्कूल मे कभी शांती नही होती, किसीका रोंना, चिल्लाना, झगडे, कुछ ना कुछ शूरु ही होता हैं, उसी स्कूल मे आज के दिन सुकून का आना होता हैं भले ही 2 मिनीट के लीए ही सही मगर होता जरूर हैं. हम बिन दिमाग लडाये काम करने वाले हमे उस उम्र मे आझादी से क्या लेना - देना, हमारी आझादी तब रोज होती थी. हमारे लिए कोई दिन मायने नही रखता था उस उम्र मे.
आज आझादी सुनते ही बचपन याद आ बैठता हैं, बढती उम्र मे कुछ सितम अभि भी शूरु हैं, आझादी से लडना हैं या आझाद होने के लिए लडना है हम तो ईसी चक्कर मे उम्र गुजार दे.
Slogans of yesteryears like "Freedom is my birthright" have taken a modern twist. Today's youth might chant, "Online or offline, freedom is divine!" The fight for freedom now involves encryption, data protection, and digital literacy. From meme-worthy hashtags to thought-provoking content, they're reclaiming their freedom one click at a time. The classroom rebellions might have evolved, but the spirit remains strong. Remember how we used to chant "No more homework!"? Today's youth have reimagined that as "No more online trolls!" They're demanding a world where freedom includes the right to express themselves without fear of cyberbullying or hate speech. It's a movement that's both funny and fantastic, as they use witty tweets and shareable posts to spread awareness about the importance of a respectful online space.
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